Saturday, 6 July 2019

1. बालकाण्ड

 श्री रामचरितमानस -  ‼प्रथम सोपान‼   बालकाण्ड
|| संकलन - भोलादास ||                           

श्रीरामचरित मानस का टंकड़कार्य श्री भोलादास जो बाबा के परम भक्त एवं सेवक है के द्वारा गुरुदेव की आज्ञानुसार दिनांक १९ फरबरी २०१९ मंगलबार से नियमित रूप से किया जा रहा है | प्रत्येक अंश को पढ़कर, समझकर फिर टाइप करने से निश्चित ही इसमें भाव प्रवलता है | यह पाठ बाबा एवं गुरुदेव को समर्पित है अतः इसके  पठन पाठन से एक असीम आनंद एवं ऊर्जा की प्राप्ति होगी ऐसा मेरा मानना है | अधिक से अधिक पाठक एवं भक्त इससे लाभान्वित हो सके इसके लिए इसे एक स्थान पर संकलित किया गया है | टंकण कार्य एवं संकलन के दौरान कुछ त्रुटियां हो सकती है; अतः आपके संज्ञान में कोई त्रुटि आती है तो अवश्य अवगत कराये जिससे सुधार किया जा सके |
श्लोक 

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि मंगलानां च कत्तारौ  वन्दे वाणीविनायकौ | |  
वन्दे श्रद्धा विश्वास रूपिणौ याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तः स्थमीश्वरम् ।२ ।     
अक्षरौं,अर्थसमूहों, रसों,छंदों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजी की में वंदना करता हूँ ।।1।।
श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप श्रीपार्वतजी और श्रीशंकरजी  की में वंदना करता हूँ,जिसके बिना सिद्धजन अपने अंतःकरण में स्थित ईश्वर को नही देख सकते।।२ 

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकररूपिणम।यमाश्रितो हि वक्रोअपि चन्द्र:सर्वत्र वंधते।।3।।                          सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्य विहारिणौ। वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ।।4।।               उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोअहं रामवल्लभाम् ।।5।।              


ज्ञानमय,नित्य,शंकररूपी गुरु की में वंदना करता हूँ,जिनके आश्रित होने से ही टेढ़ा चंद्रमा भी सर्वत्र वन्दित होता है।।3।।                
श्री सीतारामजी के गुणसमूहरूपी पवित्र वन में विहार करने वाले ,विशुद्ध विज्ञानसम्पन्न कविश्वर श्री वाल्मीकि जी और कपिश्वर श्री हनुमानजी की में वंदना करता हूँ।।4।।                 
उत्पत्ति,पालन और संघार करने वाली ,क्लेशों की हरनेवाली तथा सम्पूर्ण कल्याणौं की करनेवाली श्री रामचंद्रजी की प्रियतम श्रीसीताजी को मैं नमस्कार करता हूँ।।5।।            

 यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलमं ब्रम्हादिदेवसुरा, यत्सत्तवादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः।यत्पादप्लवमेकमेव हि  भवाम्भोधे स्तितीर्षावतां, वन्देअहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम् 


जिनकी माया के वशीभूत सम्पूर्ण विश्व, ब्रम्हादि देवता और असुर हैं,जिनकी सत्ता से रस्सी में सर्प के भ्रम की भाँति यह सारा दृश्य जगत सत्य ही प्रतीत होता है और जिनके केवल चरण ही भवसागर से तरने की इच्छा वालों के लिए एकमात्र  नौका हैं, उन समस्त कारणों से पर राम कहाने वाले भगवान हरि की मैं वंदना करता हूँ।।6।।
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्, रामायणे निगिदितं कवचिदन्यतोअपि।
स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा, भाषानिबंधमतिमञजुलमातनोति
अनेक पुराण,वेद और तंत्र शास्त्र से सम्मत तथा जो रामायण में वर्णित और कुछ अन्यत्र से भी उपलब्ध श्री रघुनाथजी की कथा को तुलसीदास अपने अन्तः करण के सुख के लिए अत्यंत मनोहर भाषा रचना  में विस्तृत करता है ।।7।।

सोरठा 
जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।।1।।
मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन।
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन।।2।।
नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन।
करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन।।3।।
कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन।
जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन।।4।।
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर।।5।।

अर्थ:---
जिन्हें स्मरण करने से सब कार्य सिद्ध होते हैं,जो गणों के स्वामी और सुंदर हाथी के मुखवाले हैं,वे ही बुद्धि के राशी और शुभ गुणों के धाम(श्री गणेश जी)मुझ पर कृपा करें।।1।।
जिनकी कृपा से गूंगा बहुत सुंदर बोलनेवाला हो जाता है और लंगड़ा लूला दुर्गम पहाड़ पर चढ़ जाता है,वे कलयुग के सब पापों को जला डालने वाले दयालु (भगवान) मुझ पर दया करें।।2।।
जो नीलकमल के समान श्यामवर्ण हैं,पूर्ण खिले हुए लाल कमल के समान जिनके नेत्र हैं और जो सदा क्षीरसागर में शयन करते हैं, वे भगवान(नारायण)मेरे ह्रदय में निवास करें।।3।।
जिनका कुंद के पुष्प और चंद्रमा के समान सरीर है,जो पार्वतीजी के प्रियतम और दया के धाम हैं और जिनका दिनों पर स्नेह है ,वे कामदेव का मर्दन करनेवाले (शंकरजी)मुझ पर कृपा करैं।।4।।

में उन गुरुमहाराज के चरणकमल की वंदना करता हूँ,जो कृपा के समुद्र और नररूप में श्री हरि ही हैं और जिनके वचन महामोहरूपी घने अंधकार के नाश करने के लिए सूर्य किरणों के समूह हैं।।5।।

दोहा
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान ।
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान ।।1।।

जैसे सिद्धाजञन को नेत्रों में लगाकर साधक,सिद्ध और सुजान पर्वतों, वनों और पृथ्वी के अंदर कौतुक से ही बहुत सी खानें देखते हैं।।1।।

चौपाई 
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन । नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन ।। 
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन । बरनउ राम चरित भव मोचन ।।
श्री गुरू महाराज के चरणों की रज कोमल और सुंदर नयनामृत-अंजन है, जो नेत्रों के दोषों का नाश करनेवाला है।उस अंजन से विवेकरूपी नेत्रों को निर्मल करके मैं संसार रूपी बंधन से छुड़ानेवाले श्री रामचरित्र का वर्णन करता हूं।।1।।

बंदउँ प्रथम महीसुर चरना । मोह जनित संसय सब हरना ।। 
सुजन समाज सकल गुन खानी । करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी ।।
 पहले पृथ्वी के देवता ब्राह्मणों के चरणों की वंदना करता हूँ,जो अज्ञान से उत्पन्न सब संदेहों को हरनेवाले हैं।फिर सब गुणों की खान संत-समाज को प्रेम सहित सुंदरवाणी से प्रणाम करता हूँ।।2।।

साधु चरित सुभ चरित कपासू । निरस बिसद गुनमय फल जासु ।। 
जो सहि दुख परिछिद्र दुरावा । बंदनीय जेहिं जग जस पावा ।।

संतों का चरित्र कपास के चरित्र(जीवन) के समान शुभ है, जिसका फल नीरस,विशद और गुणमय होता है।(कपास की डोडी नीरस होती है, संत-चरित्र में भी विषयासक्ति नहीं है, इससे वह भी नीरस है, कपास उज्ज्वल होता है, संत का ह्रदय भी अज्ञान और पापरूपी अंधकार से रहित होता है ,इसलिए वह विशद है, और कपास में गुण तंतु होते हैं,इसी प्रकार संत का चरित्र भी सदगुणों का भंडार होता है, इसलिए वह गुणमय है।)(जैसे कपास का धागा सूई के किये हुए छेद को अपना तन देकर ढक देता है,अथवा कपास जेसे काते जाने का कष्ट सहकर भी वस्त्र के रूप में परिणत होकर दूसरों के गोपनीय स्थानों को ढकता है उसी प्रकार )संत स्वयं दुःख सहकर दूसरों के दोषों को ढकता है,जिसके कारण उसने जगत में वन्दनीय यश प्राप्त किया है।।3।।


मुद मंगलमय संत समा ।जो जग जंगम तीरथराजू।।
राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा।सरसइ ब्रम्हा बिचार प्रचारा।।

संतों का समाज आनंद और कल्याणमय है, जो जगत में चलता फिरता तीर्थराज(प्रयाग)है।जहाँ (उस संतसमाजरूपी प्रयागराज में)रामभक्तिरूपी गंगाजी की धारा है और ब्रम्हा विचार का प्रचार सरस्वतीजी हैं।।4।।

बिधि निषेधमय कलिमल हरनी।करम कथा रबिनंदनि बरनी।। 
हरि हर कथा बिराजति बेनी।सुनत सकल मुद मंगल देनी।।

विधि और निषेध रूपी कर्मों की कथा कलियुग के पापों को हरनेवाली सूर्यतनया यमुनाजी हैं और भगवान विष्णु और शंकरजी की कथाएँ त्रिवेणीरूप से सुशोभित हैं, जो सुनते ही सब आनंद और कल्याणों की देने वाली है।।5।।

बटु बिस्वास अचल निज धरमा।तीरथराज समाज सुकरमा।। 
सबहि सुलभ सब दिन सब देसा।सेवत सादर समन कलेसा।।

(उस संतसमाजरूपी प्रयाग में)अपने धर्म में जो अटल विश्वास है वह अक्षवट है, और शुभकर्म ही उस तीर्थराज का समाज है।वह (संतसमाजरूपी प्रयागराज) सब देशों में ,सब समय सभी को सहजही में प्राप्त हो सकता है और आदरपूर्वक सेवन करने से क्लेशों को नष्ट करनेवाला है।।6।।

अकथ अलौकिक तीरथराऊ।देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ।।

वह तीर्थराज अलौकिक और अकथनीय है, एवं तत्काल फल देने वाला है, उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है।।7।।